Job · बाइबल (हिन्दी)

Job 31

1“मैंने अपनी आँखों के विषय वाचा बाँधी है, 1 फिर मैं किसी कुँवारी पर क्यों आँखें लगाऊँ? 1

2क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग से कौन सा अंश 1 और सर्वशक्तिमान ऊपर से कौन सी सम्पत्ति बाँटता है? 1

3क्या वह कुटिल मनुष्यों के लिये विपत्ति 1 और अनर्थ काम करनेवालों के लिये सत्यानाश का कारण नहीं है + 31:3 क्या वह कुटिल मनुष्यों के लिये विपत्ति .... का कारण नहीं है: अय्यूब कहता है कि वह भलीभांति जानता है कि दुष्ट का विनाश निश्चित है। ? 1

4क्या वह मेरी गति नहीं देखता 1 और क्या वह मेरे पग-पग नहीं गिनता? 1

5यदि मैं व्यर्थ चाल चलता हूँ, 1 या कपट करने के लिये मेरे पैर दौड़े हों; 1

6(तो मैं धर्म के तराजू में तौला जाऊँ, 1 ताकि परमेश्वर मेरी खराई को जान ले)। 1

7यदि मेरे पग मार्ग से बहक गए हों, 1 और मेरा मन मेरी आँखों की देखी चाल चला हो, 1 या मेरे हाथों में कुछ कलंक लगा हो; 1

8तो मैं बीज बोऊँ, परन्तु दूसरा खाए; 1 वरन् मेरे खेत की उपज उखाड़ डाली जाए। 1

9“यदि मेरा हृदय किसी स्त्री पर मोहित हो गया है, 1 और मैं अपने पड़ोसी के द्वार पर घात में बैठा हूँ; 1

10तो मेरी स्त्री दूसरे के लिये पीसे, 1 और पराए पुरुष उसको भ्रष्ट करें। 1

11क्योंकि वह तो महापाप होता; 1 और न्यायियों से दण्ड पाने के योग्य अधर्म का काम होता; 1

12क्योंकि वह ऐसी आग है जो जलाकर भस्म कर देती है + 31:12 वह ऐसी आग है जो जलाकर भस्म कर देती है: इसका सम्भावित अर्थ है कि ऐसा कुकर्म एक अपराध है जिसके कारण परमेश्वर विनाश ढाने पर विवश होता है। , 1 और वह मेरी सारी उपज को जड़ से नाश कर देती है। 1

13“जब मेरे दास व दासी ने मुझसे झगड़ा किया, 1 तब यदि मैंने उनका हक़ मार दिया हो; 1

14तो जब परमेश्वर उठ खड़ा होगा, तब मैं क्या करूँगा? 1 और जब वह आएगा तब मैं क्या उत्तर दूँगा? 1

15क्या वह उसका बनानेवाला नहीं जिसने मुझे गर्भ में बनाया? 1 क्या एक ही ने हम दोनों की सूरत गर्भ में न रची थी? 1

16“यदि मैंने कंगालों की इच्छा पूरी न की हो, 1 या मेरे कारण विधवा की आँखें कभी निराश हुई हों, 1

17या मैंने अपना टुकड़ा अकेला खाया हो, 1 और उसमें से अनाथ न खाने पाए हों, 1

18(परन्तु वह मेरे लड़कपन ही से मेरे साथ इस प्रकार पला जिस प्रकार पिता के साथ, 1 और मैं जन्म ही से विधवा को पालता आया हूँ); 1

19यदि मैंने किसी को वस्त्रहीन मरते हुए देखा, 1 या किसी दरिद्र को जिसके पास ओढ़ने को न था 1

20और उसको अपनी भेड़ों की ऊन के कपड़े न दिए हों, 1 और उसने गर्म होकर मुझे आशीर्वाद न दिया हो; 1

21या यदि मैंने फाटक में अपने सहायक देखकर 1 अनाथों के मारने को अपना हाथ उठाया हो, 1

22तो मेरी बाँह कंधे से उखड़कर गिर पड़े, 1 और मेरी भुजा की हड्डी टूट जाए। 1

23क्योंकि परमेश्वर के प्रताप के कारण मैं ऐसा नहीं कर सकता था, 1 क्योंकि उसकी ओर की विपत्ति के कारण मैं भयभीत होकर थरथराता था। 1

24“यदि मैंने सोने का भरोसा किया होता, 1 या कुन्दन को अपना आसरा कहा होता, 1

25या अपने बहुत से धन 1 या अपनी बड़ी कमाई के कारण आनन्द किया होता, 1

26या सूर्य को चमकते 1 या चन्द्रमा को महाशोभा से चलते हुए देखकर 1

27मैं मन ही मन मोहित हो गया होता, 1 और अपने मुँह से अपना हाथ चूम लिया होता; 1

28तो यह भी न्यायियों से दण्ड पाने के योग्य अधर्म का काम होता; 1 क्योंकि ऐसा करके मैंने सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर का इन्कार किया होता। 1

29“ यदि मैं अपने बैरी के नाश से आनन्दित होता + 31:29 यदि मैं अपने बैरी के नाश से आनन्दित होता: अय्यूब अब अपराधों की एक और श्रेणी की चर्चा करता है जिसमें भी वह निर्दोष है। यहाँ विषय है कि हमारी हानि करनेवालों के साथ भी अच्छा व्यवहार करें। , 1 या जब उस पर विपत्ति पड़ी तब उस पर हँसा होता; 1

30(परन्तु मैंने न तो उसको श्राप देते हुए, 1 और न उसके प्राणदण्ड की प्रार्थना करते हुए अपने मुँह से पाप किया है); 1

31यदि मेरे डेरे के रहनेवालों ने यह न कहा होता, 1 ‘ऐसा कोई कहाँ मिलेगा, जो इसके यहाँ का माँस खाकर तृप्त न हुआ हो?’ 1

32(परदेशी को सड़क पर टिकना न पड़ता था; 1 मैं बटोही के लिये अपना द्वार खुला रखता था); 1

33यदि मैंने आदम के समान अपना अपराध छिपाकर 1 अपने अधर्म को ढाँप लिया हो, 1

34इस कारण कि मैं बड़ी भीड़ से भय खाता था, 1 या कुलीनों से तुच्छ किए जाने से डर गया 1 यहाँ तक कि मैं द्वार से बाहर न निकला- 1

35भला होता कि मेरा कोई सुननेवाला होता! 1 सर्वशक्तिमान परमेश्वर अभी मेरा न्याय चुकाए! देखो, मेरा दस्तखत यही है। 1 भला होता कि जो शिकायतनामा मेरे मुद्दई ने लिखा है वह मेरे पास होता! 1

36निश्चय मैं उसको अपने कंधे पर उठाए फिरता; 1 और सुन्दर पगड़ी जानकर अपने सिर में बाँधे रहता। 1

37मैं उसको अपने पग-पग का हिसाब देता; 1 मैं उसके निकट प्रधान के समान निडर जाता। 1

38“यदि मेरी भूमि मेरे विरुद्ध दुहाई देती हो, 1 और उसकी रेघारियाँ मिलकर रोती हों; 1

39यदि मैंने अपनी भूमि की उपज बिना मजदूरी दिए खाई, 1 या उसके मालिक का प्राण लिया हो; 1

40तो गेहूँ के बदले झड़बेरी, 1 और जौ के बदले जंगली घास उगें!” 1 अय्यूब के वचन पूरे हुए हैं।

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