Proverbs 31
1लमूएल राजा के प्रभावशाली वचन, जो उसकी माता ने उसे सिखाए। 1
2हे मेरे पुत्र, हे मेरे निज पुत्र! 1 हे मेरी मन्नतों के पुत्र + 31:2 मेरी मन्नतों के पुत्र: शमूएल और शिमशोन जैसे पुत्र जो प्रायः प्रार्थना द्वारा प्राप्त हुए। समर्पण की शपथ से अनुमोदित प्रार्थना।! 1
3अपना बल स्त्रियों को न देना, 1 न अपना जीवन उनके वश कर देना जो राजाओं का पौरूष खा जाती हैं। 1
4हे लमूएल, राजाओं को दाखमधु पीना शोभा नहीं देता, 1 और मदिरा चाहना, रईसों को नहीं फबता; 1
5ऐसा न हो कि वे पीकर व्यवस्था को भूल जाएँ 1 और किसी दुःखी के हक़ को मारें। 1
6मदिरा उसको पिलाओ जो मरने पर है, 1 और दाखमधु उदास मनवालों को ही देना; 1
7जिससे वे पीकर अपनी दरिद्रता को भूल जाएँ 1 और अपने कठिन श्रम फिर स्मरण न करें। 1
8गूँगे के लिये अपना मुँह खोल, 1 और सब अनाथों का न्याय उचित रीति से किया कर। 1
9अपना मुँह खोल और धर्म से न्याय कर, 1 और दीन दरिद्रों का न्याय कर। 1 सदाचारी पत्नी 1
10भली पत्नी कौन पा सकता है? 1 क्योंकि उसका मूल्य मूँगों से भी बहुत अधिक है। 1
11उसके पति के मन में उसके प्रति विश्वास है, 1 और उसे लाभ की घटी नहीं होती। 1
12वह अपने जीवन के सारे दिनों में उससे बुरा नहीं, 1 वरन् भला ही व्यवहार करती है। 1
13वह ऊन और सन ढूँढ़ ढूँढ़कर, 1 अपने हाथों से प्रसन्नता के साथ काम करती है। 1
14वह व्यापार के जहाजों के समान अपनी भोजनवस्तुएँ दूर से मँगवाती है। 1
15वह रात ही को उठ बैठती है, 1 और अपने घराने को भोजन खिलाती है 1 और अपनी दासियों को अलग-अलग काम देती है। 1
16वह किसी खेत के विषय में सोच विचार करती है 1 और उसे मोल ले लेती है; और अपने परिश्रम के फल से दाख की बारी लगाती है। 1
17वह अपनी कमर को बल के फेंटे से कसती है, 1 और अपनी बाहों को दृढ़ बनाती है। (लूका 12:35) 1
18वह परख लेती है कि मेरा व्यापार लाभदायक है। 1 रात को उसका दिया नहीं बुझता। 1
19वह अटेरन में हाथ लगाती है, 1 और चरखा पकड़ती है। 1
20वह दीन के लिये मुट्ठी खोलती है, 1 और दरिद्र को सम्भालने के लिए हाथ बढ़ाती है। 1
21वह अपने घराने के लिये हिम से नहीं डरती, 1 क्योंकि उसके घर के सब लोग लाल कपड़े पहनते हैं। 1
22वह तकिये बना लेती है; 1 उसके वस्त्र सूक्ष्म सन और बैंगनी रंग के होते हैं। 1
23जब उसका पति सभा में देश के पुरनियों के संग बैठता है, 1 तब उसका सम्मान होता है। 1
24वह सन के वस्त्र बनाकर बेचती है; 1 और व्यापारी को कमरबन्द देती है। 1
25वह बल और प्रताप का पहरावा पहने रहती है, 1 और आनेवाले काल के विषय पर हँसती है + 31:25 आनेवाले काल के विषय पर हँसती है: अर्थात् वह चिन्तित होकर भविष्य को नहीं देखती परन्तु आत्म-विश्वास के साथ हर्ष से देखती है।। 1
26वह बुद्धि की बात बोलती है + 31:26 वह बुद्धि की बात बोलती है: एक सच्ची पत्नी के मुख से निकलने वाले वचन श्रोताओं के लिए नियम निर्धारक मार्गदर्शन एवं निर्देशन स्वरूप होते हैं।, 1 और उसके वचन कृपा की शिक्षा के अनुसार होते हैं। 1
27वह अपने घराने के चाल चलन को ध्यान से देखती है, 1 और अपनी रोटी बिना परिश्रम नहीं खाती। 1
28उसके पुत्र उठ उठकर उसको धन्य कहते हैं, 1 उनका पति भी उठकर उसकी ऐसी प्रशंसा करता है: 1
29“बहुत सी स्त्रियों ने अच्छे-अच्छे काम तो किए हैं परन्तु तू उन सभी में श्रेष्ठ है।” 1
30शोभा तो झूठी और सुन्दरता व्यर्थ है, 1 परन्तु जो स्त्री यहोवा का भय मानती है, उसकी प्रशंसा की जाएगी। 1
31उसके हाथों के परिश्रम का फल उसे दो, 1 और उसके कार्यों से सभा में उसकी प्रशंसा होगी।