Psalms 109
1हे परमेश्वर तू, जिसकी मैं स्तुति करता हूँ, चुप न रह! 1
2क्योंकि दुष्ट और कपटी मनुष्यों ने मेरे विरुद्ध मुँह खोला है, 1 वे मेरे विषय में झूठ बोलते हैं। 1
3उन्होंने बैर के वचनों से मुझे चारों ओर घेर लिया है, 1 और व्यर्थ मुझसे लड़ते हैं। (यूह. 15:25) 1
4मेरे प्रेम के बदले में वे मेरी चुगली करते हैं, 1 परन्तु मैं तो प्रार्थना में लौलीन रहता हूँ। 1
5उन्होंने भलाई के बदले में मुझसे बुराई की 1 और मेरे प्रेम के बदले मुझसे बैर किया है। 1
6तू उसको किसी दुष्ट के अधिकार में रख, 1 और कोई विरोधी उसकी दाहिनी ओर खड़ा रहे। 1
7जब उसका न्याय किया जाए, तब वह दोषी निकले, 1 और उसकी प्रार्थना पाप गिनी जाए! 1
8उसके दिन थोड़े हों, 1 और उसके पद को दूसरा ले! (प्रेरि. 1:20) 1
9उसके बच्चे अनाथ हो जाएँ, 1 और उसकी स्त्री विधवा हो जाए! 1
10और उसके बच्चे मारे-मारे फिरें, और भीख माँगा करे; 1 उनको अपने उजड़े हुए घर से दूर जाकर टुकड़े माँगना पड़े! 1
11महाजन फंदा लगाकर, उसका सर्वस्व ले ले + 109:11 महाजन फंदा लगाकर, उसका सर्वस्व ले ले: प्रार्थना यह है, कि वह ऐसी परिस्थितियों में हो सकता है कि उसकी सम्पूर्ण सम्पदा छीननेवालों के हाथों में पड़ जाए।; 1 और परदेशी उसकी कमाई को लूट लें! 1
12कोई न हो जो उस पर करुणा करता रहे, 1 और उसके अनाथ बालकों पर कोई तरस न खाए! 1
13उसका वंश नाश हो जाए, 1 दूसरी पीढ़ी में उसका नाम मिट जाए! 1
14उसके पितरों का अधर्म यहोवा को स्मरण रहे, 1 और उसकी माता का पाप न मिटे! 1
15वह निरन्तर यहोवा के सम्मुख रहे, 1 वह उनका नाम पृथ्वी पर से मिटे! 1
16क्योंकि वह दुष्ट, करुणा करना भूल गया 1 वरन् दीन और दरिद्र को सताता था 1 और मार डालने की इच्छा से खेदित मनवालों के पीछे पड़ा रहता था। 1
17वह श्राप देने से प्रीति रखता था, और श्राप उस पर आ पड़ा; 1 वह आशीर्वाद देने से प्रसन्न न होता था, 1 इसलिए आशीर्वाद उससे दूर रहा। 1
18वह श्राप देना वस्त्र के समान पहनता था, 1 और वह उसके पेट में जल के समान 1 और उसकी हड्डियों में तेल के समान + 109:18 उसकी हड्डियों में तेल के समान: जैसे कि उसकी हड्डियों से तेल बह रहा हो, वैसे ही श्राप का प्रभाव उसके सम्पूर्ण शरीर में समा जाए। समा गया। 1
19वह उसके लिये ओढ़ने का काम दे, 1 और फेंटे के समान उसकी कमर में नित्य कसा रहे। 1
20यहोवा की ओर से मेरे विरोधियों को, 1 और मेरे विरुद्ध बुरा कहनेवालों को यही बदला मिले! 1
21परन्तु हे यहोवा प्रभु, तू अपने नाम के निमित्त मुझसे बर्ताव कर; 1 तेरी करुणा तो बड़ी है, इसलिए तू मुझे छुटकारा दे! 1
22क्योंकि मैं दीन और दरिद्र हूँ, 1 और मेरा हृदय घायल हुआ है + 109:22 मेरा हृदय घायल हुआ है: मुझ में न तो साहस है, न ही शक्ति रही है। मैं युद्ध क्षेत्र में एक घायल सैनिक के सदृश्य हूँ। । 1
23मैं ढलती हुई छाया के समान जाता रहा हूँ; 1 मैं टिड्डी के समान उड़ा दिया गया हूँ। 1
24उपवास करते-करते मेरे घुटने निर्बल हो गए; 1 और मुझ में चर्बी न रहने से मैं सूख गया हूँ। 1
25मेरी तो उन लोगों से नामधराई होती है; 1 जब वे मुझे देखते, तब सिर हिलाते हैं। (इब्रा. 10:12-13, लूका 20:42-43) 1
26हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मेरी सहायता कर! 1 अपनी करुणा के अनुसार मेरा उद्धार कर! 1
27जिससे वे जाने कि यह तेरा काम है, 1 और हे यहोवा, तूने ही यह किया है! 1
28वे मुझे कोसते तो रहें, परन्तु तू आशीष दे! 1 वे तो उठते ही लज्जित हों, परन्तु तेरा दास आनन्दित हो! (1 कुरि. 4:12) 1
29मेरे विरोधियों को अनादररूपी वस्त्र पहनाया जाए, 1 और वे अपनी लज्जा को कम्बल के समान ओढ़ें! 1
30मैं यहोवा का बहुत धन्यवाद करूँगा, 1 और बहुत लोगों के बीच में उसकी स्तुति करूँगा। 1
31क्योंकि वह दरिद्र की दाहिनी ओर खड़ा रहेगा, 1 कि उसको प्राणदण्ड देनेवालों से बचाए।