Psalms 40
1मैं धीरज से यहोवा की बाट जोहता रहा; 1 और उसने मेरी ओर झुककर मेरी दुहाई सुनी। 1
2उसने मुझे सत्यानाश के गड्ढे 1 और दलदल की कीच में से उबारा + 40:2 दलदल की कीच में से उबारा: गड़हे के तल में ठोस भूमि, चट्टान नहीं थी कि खड़ा हो पाता।, 1 और मुझ को चट्टान पर खड़ा करके 1 मेरे पैरों को दृढ़ किया है। 1
3उसने मुझे एक नया गीत सिखाया 1 जो हमारे परमेश्वर की स्तुति का है। 1 बहुत लोग यह देखेंगे और उसकी महिमा करेंगे, 1 और यहोवा पर भरोसा रखेंगे। (प्रका. 5:9, प्रका. 14:3, भज. 52:6) 1
4क्या ही धन्य है वह पुरुष, 1 जो यहोवा पर भरोसा करता है, 1 और अभिमानियों और मिथ्या की 1 ओर मुड़नेवालों की ओर मुँह न फेरता हो। 1
5हे मेरे परमेश्वर यहोवा, तूने बहुत से काम किए हैं! 1 जो आश्चर्यकर्मों और विचार तू हमारे लिये करता है 1 वह बहुत सी हैं; तेरे तुल्य कोई नहीं! 1 मैं तो चाहता हूँ कि खोलकर उनकी चर्चा करूँ, 1 परन्तु उनकी गिनती नहीं हो सकती। 1
6मेलबलि और अन्नबलि से तू प्रसन्न नहीं होता 1 तूने मेरे कान खोदकर खोले हैं। 1 होमबलि और पापबलि तूने नहीं चाहा + 40:6 तूने नहीं चाहा: उसने उनकी इच्छा नहीं की वह आज्ञाकारिता के आगे इनसे प्रसन्न नहीं होगा। । 1
7तब मैंने कहा, 1 “देख, मैं आया हूँ; क्योंकि पुस्तक में 1 मेरे विषय ऐसा ही लिखा हुआ है। 1
8हे मेरे परमेश्वर, 1 मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूँ; 1 और तेरी व्यवस्था मेरे अन्तःकरण में बसी है।” (इब्रा. 10:5-7) 1
9मैंने बड़ी सभा में धार्मिकता के शुभ समाचार का प्रचार किया है; 1 देख, मैंने अपना मुँह बन्द नहीं किया हे यहोवा, 1 तू इसे जानता है। 1
10मैंने तेरी धार्मिकता मन ही में नहीं रखा; 1 मैंने तेरी सच्चाई 1 और तेरे किए हुए उद्धार की चर्चा की है; 1 मैंने तेरी करुणा और सत्यता बड़ी सभा से गुप्त नहीं रखी। 1
11हे यहोवा, तू भी अपनी बड़ी दया मुझ पर से न हटा ले, 1 तेरी करुणा और सत्यता से निरन्तर 1 मेरी रक्षा होती रहे! 1
12क्योंकि मैं अनगिनत बुराइयों से घिरा हुआ हूँ; 1 मेरे अधर्म के कामों ने मुझे आ पकड़ा 1 और मैं दृष्टि नहीं उठा सकता; 1 वे गिनती में मेरे सिर के बालों से भी अधिक हैं; 1 इसलिए मेरा हृदय टूट गया। 1
13हे यहोवा, कृपा करके मुझे छुड़ा ले! 1 हे यहोवा, मेरी सहायता के लिये फुर्ती कर! 1
14जो मेरे प्राण की खोज में हैं, 1 वे सब लज्जित हों; और उनके मुँह काले हों 1 और वे पीछे हटाए और निरादर किए जाएँ 1 जो मेरी हानि से प्रसन्न होते हैं। 1
15जो मुझसे, “आहा, आहा,” कहते हैं, 1 वे अपनी लज्जा के मारे विस्मित हों। 1
16परन्तु जितने तुझे ढूँढ़ते हैं, 1 वह सब तेरे कारण हर्षित 1 और आनन्दित हों; जो तेरा किया हुआ उद्धार चाहते हैं, 1 वे निरन्तर कहते रहें, “यहोवा की बड़ाई हो!” 1
17मैं तो दीन और दरिद्र हूँ, 1 तो भी प्रभु मेरी चिन्ता करता है। 1 तू मेरा सहायक और छुड़ानेवाला है; 1 हे मेरे परमेश्वर विलम्ब न कर।