Psalms 32
1क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध 1 क्षमा किया गया, 1 और जिसका पाप ढाँपा गया हो + 32:1 जिसका पाप ढाँपा गया हो: ढाँक दिया गया अर्थात् छिपाया गया या गुप्त रखा गया दूसरे शब्दों में ऐसा ढाँका गया कि दिखाई नहीं देगा।। (रोम. 4:7) 1
2क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म 1 का यहोवा लेखा न ले, 1 और जिसकी आत्मा में कपट न हो। (रोम. 4:8) 1
3जब मैं चुप रहा 1 तब दिन भर कराहते-कराहते मेरी हड्डियाँ 1 पिघल गई। 1
4क्योंकि रात-दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; 1 और मेरी तरावट धूपकाल की सी झुर्राहट 1 बनती गई। (सेला) 1
5जब मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया 1 और अपना अधर्म न छिपाया, 1 और कहा, “मैं यहोवा के सामने अपने अपराधों को मान लूँगा;” 1 तब तूने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया। (सेला) (1 यूह. 1:9) 1
6इस कारण हर एक भक्त तुझ से ऐसे समय 1 में प्रार्थना करे जबकि तू मिल सकता है + 32:6 में प्रार्थना करे जबकि तू मिल सकता है: अर्थात् वे उसे दया या अनुग्रह का समय देखेंगे।। 1 निश्चय जब जल की बड़ी बाढ़ आए तो भी 1 उस भक्त के पास न पहुँचेगी। 1
7तू मेरे छिपने का स्थान है; 1 तू संकट से मेरी रक्षा करेगा; 1 तू मुझे चारों ओर से छुटकारे के गीतों से घेर 1 लेगा। (सेला) 1
8मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे 1 चलना होगा उसमें तेरी अगुआई करूँगा; 1 मैं तुझ पर कृपादृष्टि रखूँगा 1 और सम्मति दिया करूँगा। 1
9तुम घोड़े और खच्चर के समान न बनो जो समझ नहीं रखते, 1 उनकी उमंग लगाम और रास से रोकनी पड़ती है, 1 नहीं तो वे तेरे वश में नहीं आने के। 1
10दुष्ट को तो बहुत पीड़ा होगी; 1 परन्तु जो यहोवा पर भरोसा रखता है 1 वह करुणा से घिरा रहेगा। 1
11हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित 1 और मगन हो, और हे सब सीधे मनवालों 1 आनन्द से जयजयकार करो!