Psalms 28
1हे यहोवा, मैं तुझी को पुकारूँगा; 1 हे मेरी चट्टान, मेरी पुकार अनसुनी न कर, 1 ऐसा न हो कि तेरे चुप रहने से 1 मैं कब्र में पड़े हुओं के समान हो जाऊँ जो पाताल में चले जाते हैं + 28:1 जो पाताल में चले जाते हैं: मृतकों के सदृश्य तनाव और निराशा से ग्रस्त होकर मर जाऊँ। । 1
2जब मैं तेरी दुहाई दूँ, 1 और तेरे पवित्रस्थान की भीतरी कोठरी 1 की ओर अपने हाथ उठाऊँ, 1 तब मेरी गिड़गिड़ाहट की बात सुन ले। 1
3उन दुष्टों और अनर्थकारियों के संग मुझे न घसीट; 1 जो अपने पड़ोसियों से बातें तो मेल की बोलते हैं, 1 परन्तु हृदय में बुराई रखते हैं। 1
4उनके कामों के और उनकी करनी की बुराई 1 के अनुसार उनसे बर्ताव कर, 1 उनके हाथों के काम के अनुसार उन्हें बदला दे; 1 उनके कामों का पलटा उन्हें दे। (मत्ती 16:27, प्रका. 18:6,13, प्रका. 22:12) 1
5क्योंकि वे यहोवा के कामों को 1 और उसके हाथ के कामों को नहीं समझते, 1 इसलिए वह उन्हें पछाड़ेगा और फिर न उठाएगा + 28:5 फिर न उठाएगा: परमेश्वर उन पर अनुग्रह नहीं करेगा, वह उन्हें समृद्धि प्रदान नहीं करेगा।। 1
6यहोवा धन्य है; 1 क्योंकि उसने मेरी गिड़गिड़ाहट को सुना है। 1
7यहोवा मेरा बल और मेरी ढाल है; 1 उस पर भरोसा रखने से मेरे मन को सहायता मिली है; 1 इसलिए मेरा हृदय प्रफुल्लित है; 1 और मैं गीत गाकर उसका धन्यवाद करूँगा। 1
8यहोवा अपने लोगों की सामर्थ्य है, 1 वह अपने अभिषिक्त के लिये उद्धार का दृढ़ गढ़ है। 1
9हे यहोवा अपनी प्रजा का उद्धार कर, 1 और अपने निज भाग के लोगों को आशीष दे; 1 और उनकी चरवाही कर और सदैव उन्हें सम्भाले रह।